O LEVEL | M1-R5 | INTERNET PROTOCOL BY. SUNRISE COMPUTER

INTERNET PROTOCOL (IP)

इसका पूरा नाम Internet protocol (इंटरनेट प्रोटोकॉल) होता है। यह कई नियमो का एक समूह (set) है जिसका प्रयोग इंटरनेट पर कम्युनिकेशन करने और डेटा ट्रांसफर की प्रक्रिया को कण्ट्रोल करने के लिए किया जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग डेटा पैकेट को source से destination तक भेजने के लिए किया जाता है। इस प्रोटोकॉल को TCP/IP या UDP/IP के नाम से भी जाना जाता है जो connectionless (कनेक्शन रहित) सेवाएं प्रदान करता है। इंटरनेट प्रोटोकॉल का पहला वर्जन IPv4 था। इसके बाद 2006 में इसका दूसरा वर्जन बजार में आया जिसका नाम IPv6 था। यह एक लोकप्रिय प्रोटोकॉल है जिसका प्रयोग तेजी से किया जाने लगा।

INTERNET PROTOCOL | TYPES

  • IPv4
  • IPv6
TYPES | INTERNET PROTOCOL VERSION 4

  • IPv4 का पूरा नाम Internet protocol version 4 है यह इन्टरनेट प्रोटोकॉल का चौथा version है। इसे 1981 में IETF (internet engineering task force) ने विकसित किया था
  • इसका प्रयोग नेटवर्क में data packets को होस्ट डिवाइस से डेस्टिनेशन डिवाइस तक deliver करने में किया जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग एक network में devices को identify करने के लिए किया जाता है।
  • IPv4 एक connection less प्रोटोकॉल है जिसका प्रयोग packet switched layer नेटवर्क्स (जैसे:- Ethernet) में किया जाता है।
  • IPv4 किसी भी network में hosts के लिए IP address को assign करने का एक स्टैण्डर्ड protocol होता है। अभी आप इसी protocol को use कर रहे है। ये protocol इस दुनिया में उपलब्ध जितने भी devices है उनको unique address प्रदान करने में अभी तो सक्षम है लेकिन कुछ सालों बाद नहीं होगा। इसलिए इसका नया version IPV6 को विकसित किया गया है।
  • IPv4 में IP address 32 बिट्स का होता है। इसे 8 bits के 4 blocks में विभाजित (divide) किया जाता है। Example – 120.40.4.61
INTERNET PROTOCOL VERSION 4 | CHARACTERISTICS
  • इसका IP एड्रेस 32 बिट का होता है।
  • यह numeric address होता है और इसके बिट्स dot (.) के द्वारा seperate (अलग) रहते हैं।
  • इसमें header fields की संख्या 12 होती है।
  • यह VLSM (virtual length subnet mask) को सपोर्ट करता है।
  • इसके पास unicast, multicast, और broadcast प्रकार के address होते हैं।
  • इसके पास checksum fields होते हैं।
  • यह RIP (routing information protocol) को सपोर्ट करता है।
  • यह MAC address को map करने के लिए ARP (address resolution protocol) का इस्तेमाल करता है।
  • इसमें IP address की 5 अलग-अलग class होती हैं:- Class A, Class B, Class C, Class D और Class E.
INTERNET PROTOCOL VERSION 4 | ADVANTAGE
  • यह encryption प्रदान करता है जिससे privacy और security बनी रहती है।
  • IPv4 में routing की प्रक्रिया efficient (कुशल) होती है।
  • इसके द्वारा एक network में बहुत सारीं devices को एक साथ जोड़ना आसान होता है।
  • इसमें network allocation बहुत ही शानदार है।
  • यह communication का model है इसलिए यह quality service प्रदान करता है।

INTERNET PROTOCOL VERSION 4 | DIS-ADVANTAGE
  • IPv4 में internet routing अक्षम (inefficient) है।
  • ऐसे में IPV4 के द्वारा provide किये गए addresses की संख्या कम होती जा रही है। आने वाले समय में ये addresses पूरी तरह occupied हो जायेंगे और दूसरे devices के लिए address available नहीं होंगे जिस वजह से वे internet नहीं use कर पाएंगे।
  • यह data को स्वयं कोई सुरक्षा नहीं देता है। Data को भेजने से पहले उसे encrypt किया जाना चाहिए।
  • IPV4 में विशेष packets को प्राथमिकता देने का कोई option नहीं है। हालांकि IPV4 एक Quality Of Service filed define करता है। लेकिन वह packets को प्राथमिकता के क्रम में handle करने के लिये पर्याप्त नहीं है।
  • IPV4 को या तो आप manual तरीके से configure करते है या इसे dynamically DHCP (Dynamic Host Configuration Protocol) द्वारा configure किया जा सकता है। इसके लिए आपको DHCP को भी manage करना पड़ता है। इससे बहुत सी bandwidth यूज़ हो जाती है और साथ ही network administrator का time भी बर्बाद (waste) होता है।
INTERNET PROTOCOL VERSION 4 | TYPES
जब भी IPV4 packets को send या receive किया जाता है ।
  • Unicast :- एक unicast address एक विशेष host को represent (प्रस्तुत) करता है। इस तरह के एड्रेस IPV4 packet में विशेष destination host को represent करते है। इस प्रकार के address one-to-one communication के लिए प्रयोग किये जाते है। उदाहरण के लिए LAN A का एक host, LAN B के किसी host को पैकेट send करे तो वह unicast addressing कहलाएगी।
  • Multicast :- Multicast addresses का प्रयोग  packet को एक से अधिक hosts को send करने के लिए किया जाता है। ये one-to-many communication के लिए यूज़ किये जाते है।उदाहरण के लिए कोई एक host किसी दूसरे network में एक IP addresses के group को पैकेट send करता है। यह packet सिर्फ उन्हीं hosts द्वारा receive किया जाता है जो multicast group में है।
  • Broadcast :- IPv4 के द्वारा किसी एक host के packet को पुरे network में फैलाने के लिए broadcast addresses का प्रयोग किया जाता है। ये एक one-to-all communication होता है।उदाहरण के लिए एक host किसी packet को LAN में available बाकि सभी hosts को भेज सकता है।
TYPES | INTERNET PROTOCOL VERSION 6

  • IPv6 का पूरा नाम Internet Protocol Version 6 है। यह एक network layer प्रोटोकॉल है जिसका प्रयोग एक network में communication के लिए किया जाता है। इसका साइज़ 128 bits का होता है।
  • IPv4 की problems को solve करने के लिए IETF (internet engineering task force) ने IPv6 को विकसित किया था। इसे 1998 में विकसित किया गया था।
  • यह internet protocol (IP) का सबसे नया version है तथा इसमें IPv4 से ज्यादा बेहतर तथा advanced विशेषताएं (features) है। यह भविष्य में IPv4 की जगह कार्य करेगा. इस समय यह IPv4 के साथ मिलकर कार्य करता है।
  • IPv6 Address का example – 2d12:1ba8:3c4d:21d3:0000:0000:3214:ab65
  • IPv4 को 80 के दशक में बनाया गया था। तब से लेकर अब तक internet की दुनिया में बहुत ज्यादा बदलाव आ गए है। शुरुआत में internet कुछ limited organizations तक ही सिमित था, लेकिन अब यह पूरी दुनिया में फैल चूका है। दिनों दिन internet के users बढ़ते जा रहे है। इसलिए ऐसी कुछ limitations (कमियां) है जिनकी वजह से IPV4 भविष्य में internet की जरूरतों को पूरा नहीं कर पायेगा। इस लिए IPv6 को प्रयोग में लाया जा रहा है।
INTERNET PROTOCOL VERSION 6 | FEATURES
  • IPv6 में address space बहुत ही बड़ा है। ऐसा माना जाता है की इस दुनिया के हर इंसान को 20,000 IP address दिए जा सकते है। इसलिए नजदीकी भविष्य में IP address की कमी की कोई problem नहीं होगी। IPV6 का address space भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।
  • IPv6 security के लिए IPSec (Internet Protocol Security) का इस्तेमाल करता है। IPv6 की header में IPSec के लिए field प्रदान किया गया है। शुरू में ये IPV6 के साथ ही built in था लेकिन बाद में इसे optional बना दिया गया।
  • यह packets को priority (वरीयता) के आधार पर forward करने में सक्षम है। इसके लिए IPv6 header में flow label फील्ड प्रदान किया गया है। यह एक 20 bit field होता है।
  • IPv6 आपको auto configuration का फ़ीचर प्रदान करता है। इससे यदि DHCP server उपलब्ध ना हो तो भी communication में कोई problem नहीं आती है। साथ ही IPV6 में state-full और stateless दोनों तरह के configuration संभव है।
  • IPv6 का header बहुत ही simple है इसमें सिर्फ 8 fields होते है। Simple header की वजह से IPV6 पैकेट IPV4 पैकेट की तुलना में तेजी से transmit होते है।
  • यह broadcast को support नहीं करता है। एक से ज्यादा hosts को packets send करने के लिए यह multicast का प्रयोग करता है।
  • IPv6 के पूरी तरह लागू होने पर हर system के पास एक यूनिक IP address होगा। इससे हर host इन्टरनेट पर किसी दूसरे host से directly communicate कर सकता है।
  • IPV6 के लागू होने पर आपको NAT (Network Address Translation) की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
  • IPv6 के द्वारा devices जैसे कि- mobile phones किसी दूसरी location पर जाकर भी उसी IP address के साथ network से connected रह सकते है।
INTERNET PROTOCOL VERSION 6 | ADVANTAGE
  • यह reliable (विश्वसनीय) होता है।
  • इसकी speed बहुत ही fast होती है क्योंकि यह broadcast की जगह multicast को support करता है।
  • इसमें IPsec का प्रयोग किया जाता है जो कि security और data integrity प्रदान करता है।
  • यह routing table के size को कम करता है और routing ज्यादा efficient (कुशल) बनाता है।
  • इसमें peer to peer networks को create और maintain करना आसान होता है।
INTERNET PROTOCOL VERSION 6 | DIS-ADVANTAGE
  • IPv6 को याद करना बहुत ही मुश्किल होता है।
  • यह पुराने devices को support नहीं करता है।
  • IPv4 और IPv6 के मध्य कम्युनिकेशन बहुत ही Complex होता है।
  • इसमें devices को manual तरीके से IP address दिए जाते है जो कि एक complicated काम है।
INTERNET PROTOCOL VERSION 6 | TYPES
  • Unicast Address :- इसका प्रयोग एक network में यूनिक node या device को identify करने के लिए किया जाता है।
  • Multicast Address :- यह IP devices के एक समूह को प्रस्तुत करता है और इसका प्रयोग एक packet को एक समय में बहुत सारें destination को send करने के लिए किया जाता है।
  • Anycast Address :- इसका प्रयोग अलग-अलग nodes पर interface के एक समूह को identify करने के लिए किया जाता है।
TYPES | MEDIA ACCESS CONTROL ADDRESS
  • MAC Address नेटवर्क एडेप्टर के हार्डवेयर से जुड़े होते हैं, इसलिए उन्हें “Hardware Address” या “Physical Address” के रूप में भी जाना जाता है। यह विशेष रूप से लोकल एरिया नेटवर्क पर एडेप्टर की पहचान करता हैं।
  • मैक एड्रेस, हेक्साडेसिमल नोटेशन में व्यक्त किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, 48-बिट एड्रेस में “01-23-45-67-89-AB” या 64-बिट एड्रेस में “01-23-45-67-89-AB-CD-EF”। 
  • कभी-कभी, डैश (-) के बजाय कोलन (:) का उपयोग किया जाता है। मैक एड्रेस को अक्सर स्थायी माना जाता है, लेकिन कुछ स्थितियों में, उन्हें बदला जा सकता है।
  • MAC address को फिजिकल एड्रेस, हार्डवेयर एड्रेस और बर्न-इन एड्रेस के रूप में भी जाना जाता है।
  • MAC addresses आम तौर पर नेटवर्क इंटरफेस कार्ड (NIC) के निर्माता द्वारा assigne किया जाता हैं। 
  • मैक एड्रेस हेक्साडेसिमल नोटेशन में व्यक्त किए जाते हैं। यह एक 48 या 64-बिट एड्रेस होता है
  • इसमें पहला 24 बिट्स ऑर्गनाइजेशन यूनिक आइडेंटिफ़ायर के लिए उपयोग किया जाता हैं, और 24 बिट्स NIC निर्माता के लिए होता हैं।
  • MAC address स्थायी होते हैं इन्हें बदला नहीं जा सकता। 
  • दो उपकरणों में एक ही मैक एड्रेस नहीं हो सकता है। यदि ऐसा होता है, तो दोनों उपकरणों में संचार समस्याएँ होंगी क्योंकि लोकल नेटवर्क भ्रमित हो जाएगा कि किस उपकरण को पैकेट प्राप्त करना चाहिए। 
  • IEEE द्वारा प्रदान किए गए specifications का उपयोग करके मैक पता बनाया जाता है।
  • यह OSI मॉडल के Data Link Layer पर कार्य करता है।
  • यह निर्माण के समय डिवाइस निर्माता द्वारा प्रदान किया जाता है और इसके NIC में Embedded होता है।
  • ARP protocol का उपयोग लॉजिकल एड्रेस को मैक एड्रेस  से जोड़ने के लिए किया जाता है।

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